विवाहित पुत्र के कारोबार के लिए दुकान खाली कराने का आदेश बरकरार, किरायेदार की याचिका खारिज
- पंजाब
- (Asia/Kolkata)
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि कोई भी किरायेदार यह तय नहीं कर सकता कि मकान मालिक अपनी किराये पर दी गई संपत्ति वापस लिए बिना अपनी आवश्यकताओं को कैसे पूरा करे। अदालत ने यह टिप्पणी लुधियाना स्थित एक दुकान से संबंधित बेदखली मामले में किरायेदार की चुनौती को खारिज करते हुए की। मामला उस दुकान से जुड़ा था जिसे मकान मालिक अपने विवाहित पुत्र के लिए नए और स्वतंत्र व्यवसाय की शुरुआत हेतु खाली करवाना चाहता था। अदालत ने माना कि यदि मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक और ईमानदार है, तो किरायेदार वैकल्पिक सुझाव देकर या अन्य विकल्पों का हवाला देकर उस आवश्यकता को चुनौती नहीं दे सकता। न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि उच्चतम न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि किराया नियंत्रक को यह मानकर चलना चाहिए कि मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक है। अदालत ने कहा कि यह किरायेदार का दायित्व नहीं है कि वह मकान मालिक को यह बताए कि वह संपत्ति खाली करवाए बिना स्वयं को कहां और कैसे समायोजित कर सकता है। क्या था पूरा मामला? यह विवाद लुधियाना की ब्राउन रोड स्थित एक इमारत की दुकान से संबंधित था। मकान मालिक ने अदालत में याचिका दायर कर दुकान खाली करवाने की मांग की थी। उसका कहना था कि उसका पुत्र विवाह के बाद वहां स्पेयर पार्ट्स का नया कारोबार शुरू करना चाहता है और उसके पास व्यवसाय के लिए कोई अन्य दुकान उपलब्ध नहीं है। सुनवाई के दौरान मकान मालिक की ओर से अधिवक्ता वीरेन सिब्बल और शाइन सेन ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि पुत्र के पास कोई वैकल्पिक व्यावसायिक स्थान नहीं है, इसलिए दुकान की आवश्यकता पूरी तरह वास्तविक है। वहीं, किरायेदार ने तर्क दिया कि मकान मालिक के पास संपत्ति के स्वामित्व के पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं, इसलिए वह बेदखली की याचिका दायर करने का अधिकार नहीं रखता। अदालत ने किरायेदार की दलीलें कीं खारिज हाई कोर्ट ने किरायेदार के तर्कों को अस्वीकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार यह संपत्ति पहले एक पारिवारिक ट्रस्ट के अधीन थी, लेकिन अब इसका पूर्ण स्वामित्व मकान मालिक के पास है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों और जिरह के दौरान सामने आए तथ्यों से उसका स्वामित्व स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि संबंधित व्यक्ति ही संपत्ति का वास्तविक मालिक और मकान मालिक है, इसलिए उसे किराया प्राप्त करने और किरायेदार को बेदखल करने का कानूनी अधिकार है। ट्रस्टी भी कर सकता है बेदखली की कार्यवाही हाई कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही स्वामित्व के प्रश्न को अलग रख दिया जाए, तब भी किरायेदार की आपत्ति टिक नहीं सकती। अदालत ने ‘ईस्ट पंजाब अर्बन रेंट रेस्ट्रिक्शन एक्ट, 1949’ का हवाला देते हुए कहा कि “मकान मालिक” की परिभाषा में ट्रस्टी भी शामिल होता है। अदालत के अनुसार, जो व्यक्ति किराया प्राप्त करने का अधिकार रखता है, वह ट्रस्टी होने की स्थिति में भी किरायेदार के विरुद्ध बेदखली की कार्यवाही शुरू कर सकता है। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि कानून की धारा 13 के तहत केवल यह आवश्यक है कि याचिकाकर्ता “मकान मालिक” की श्रेणी में आता हो, और इस मामले में यह शर्त पूरी होती है। ‘स्वयं के उपयोग’ का व्यापक अर्थ फैसले में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक आवश्यकता का अर्थ एक ईमानदार और निष्कपट जरूरत से है, जिसके पीछे कोई गलत उद्देश्य न हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में प्रयुक्त “स्वयं के उपयोग के लिए” शब्दों का अर्थ केवल मकान मालिक की व्यक्तिगत आवश्यकता तक सीमित नहीं है। इसमें उसके ऐसे पारिवारिक सदस्य भी शामिल हैं जो उस पर निर्भर हैं या जिन पर स्वयं मकान मालिक निर्भर है। अंततः हाई कोर्ट ने 19 मई 2025 के अपीलीय आदेश को सही ठहराते हुए किरायेदार की रिवीजन याचिका खारिज कर दी और दुकान खाली कराने के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही मामले से जुड़ी अन्य लंबित अर्जियों का भी निपटारा कर दिया गया।
Leave a Reply