Supreme Court Verdict: इंटरनेट का उपयोग मौलिक अधिकार, बच्चों को इससे पूरी तरह दूर रखना गलत: सुप्रीम कोर्ट
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- (Asia/Kolkata)
सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि इंटरनेट का उपयोग और उस तक पहुंच पाना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। सर्वोच्च अदालत ने जोर देकर कहा कि ऑनलाइन खतरों से बच्चों की सुरक्षा के नाम पर उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विपरीत नहीं हैं, बल्कि बच्चों को सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों का समान अधिकार प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) का हवाला जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 15 अक्टूबर को दिए गए अपने आदेश में ये बातें कहीं, जिसकी आधिकारिक जानकारी शनिवार को सामने आई। अदालत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का हवाला देते हुए कहा कि इंटरनेट तक पहुंच और इसका उपयोग मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। पीठ ने कहा कि किसी भी उम्र के बच्चे हों, उन्हें भी वही संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं और उन्हें इससे वंचित करना अनुचित होगा। पूर्ण प्रतिबंध बच्चों के हित में नहीं अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इंटरनेट बच्चों की शिक्षा, जानकारी प्राप्त करने और विचार व्यक्त करने का एक बेहद अहम माध्यम है। विशेषकर दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए यह सीखने का प्राथमिक स्रोत है, वहीं विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए दूसरों से जुड़ने का यह एक महत्वपूर्ण जरिया बनता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और कंपनियों की विफलताओं के लिए बच्चों को सजा नहीं दी जा सकती। यदि बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर पूरी तरह से रोक लगा दी जाएगी, तो वे ऐसे असुरक्षित प्लेटफॉर्म्स की तरफ रुख कर सकते हैं जहां सुरक्षा के इंतजाम बेहद कमजोर हों। इसके अलावा, प्रतिबंध के डर से साइबर बुलिंग या यौन शोषण का शिकार हो रहे बच्चे अपने माता-पिता या अभिभावकों से अपनी आपबीती साझा करने में झिझकेंगे। सोशल मीडिया अकाउंट्स के लिए 'चाइल्ड मोड' का सुझाव ऑनलाइन सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए शीर्ष अदालत ने सोशल मीडिया अकाउंट्स में 'चाइल्ड मोड' की व्यवस्था करने का सुझाव दिया। इसके तहत बच्चों के प्रोफाइल को डिफ़ॉल्ट रूप से प्राइवेट रखना, अज्ञात वयस्कों द्वारा संदेश भेजने या संपर्क करने पर सख्त प्रतिबंध लगाना, और बच्चों को दिखाए जाने वाले विज्ञापनों तथा कंटेंट को नियंत्रित करने जैसे कदम शामिल हैं। अदालत ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल में माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी को भी जरूरी बताया। बाल यौन शोषण सामग्री हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस का आदेश बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट से बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (CSEAM) की पहचान करने तथा उसे हटाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार (इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय) को आवश्यक नियम, मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और दिशानिर्देश तैयार करने के निर्देश दिए हैं। केंद्र सरकार को इस संबंध में की गई कार्रवाई पर 10 दिसंबर तक हलफनामा दाखिल करना होगा।
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