नेल्सन मंडेला की रिहाई पर लिखी कविता से याद आया अफ्रीकी नेता का संघर्ष

नेल्सन मंडेला की रिहाई पर लिखी कविता से याद आया अफ्रीकी नेता का संघर्ष

पिछले पैंतीस साल पहले, 27 वर्षों तक जेल में बंद रहने के बाद अफ्रीकी नेता और नोबेल पुरस्कार विजेता नेल्सन मंडेला की रिहाई पर प्रो. गुरभजन सिंह गिल, चेयरमैन, पंजाबी लोक विरासत अकादमी, लुधियाना, ने एक कविता लिखी थी। इस कविता के माध्यम से उन्होंने मंडेला के संघर्ष और उनके महान व्यक्तित्व को पाठकों के सामने पेश किया। कविता में मंडेला की जेल से लौटकर अपने घर आने की भावना को अभिव्यक्त किया गया है। प्रो. गिल ने लिखा: “दो बनवासों बाद सोहणों घर आया ऐँ, जी आया नी… चिट्टे खून के काले सागर तर आया ऐँ। जी आया नी…” कविता ने मंडेला के संघर्ष, रंगभेद के खिलाफ उनके आंदोलन और उनके द्वारा लोकतंत्र स्थापित करने के संकल्प को उजागर किया। इसे “सोवियत देश” मैगज़ीन को भेजा गया था, जिसका अंग्रेजी अनुवाद प्रो. नरीनजन तसनीम ने किया और प्रकाशित किया गया। यह घटना 1990 की है। नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के ईस्टर्न केप प्रांत के छोटे से गाँव मवेज़ो में हुआ। उनके पिता गाडला हेनरी गाँव के प्रधान थे। मंडेला का परिवार क्षेत्र के शाही परिवार से जुड़ा हुआ था। उनका असली नाम रोलिहलाहला था, जिसका अर्थ है “पेड़ की डालियाँ तोड़ने वाला” या “प्रिय बच्चा”। बाद में उन्हें अपने कबीले के नाम मादीबा से जाना जाने लगा। मंडेला का बचपन धार्मिक और शिक्षा से जुड़ा हुआ था। उनकी मां ने उन्हें लगभग सात वर्ष की उम्र में मेथोडिस्ट स्कूल में पढ़ाई के लिए भेजा, जहां उन्हें “नेल्सन” नाम मिला। नौ साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। मंडेला ने अपने शुरुआती जीवन में ईसाई धर्म की शिक्षा प्राप्त की और अपने समुदाय और अफ्रीकी इतिहास के प्रति गहरी रुचि विकसित की। 1941 में मंडेला जोहानसबर्ग गए, जहां उन्होंने वाल्टर सिसुलु और वाल्टर अल्बर्टाइन से मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) में शामिल होकर रंगभेद के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। 1962 में उन्हें देश छोड़ने और मजदूरों को हड़ताल के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और 1964 में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। जेल में रहते हुए भी उन्होंने रंगभेद विरोधी आंदोलनों को समर्थन दिया। 27 साल जेल में रहने के बाद, मंडेला 11 फरवरी 1990 को रिहा हुए। रिहाई के बाद उन्होंने शांति और समझौते की नीति अपनाकर दक्षिण अफ्रीका में लोकतंत्र और बहुजातीय शासन की नींव रखी। 1994 में मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले काले राष्ट्रपति बने और 1996 में नए संविधान के तहत राजनीतिक और प्रशासनिक संस्थाएं स्थापित की गईं। प्रो. गुरभजन सिंह गिल की कविता ने मंडेला के संघर्ष और उनके नायकत्व को भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया, जो आज भी पाठकों और साहित्यिक जगत में प्रेरणा का स्रोत है।