बिना आय सीमा योजना पर हाईकोर्ट की टिप्पणी, सरकार को प्रतिनिधित्व देने की छूट
- पंजाब
- (Asia/Kolkata)
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ‘मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना’ को लेकर टिप्पणी की है कि यदि इस योजना को केवल उन लोगों तक सीमित रखा जाता जो तीर्थ यात्रा का खर्च वहन नहीं कर सकते, तो यह अधिक उपयुक्त होता। हालांकि, अदालत ने इस योजना में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति रमेश कुमारी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान की। यह याचिका आरटीआई कार्यकर्ता परविंदर सिंह किट्टणा द्वारा अधिवक्ता एच.सी. अरोड़ा और सुनेना के माध्यम से दायर की गई थी। याचिका में योजना को कई आधारों पर चुनौती दी गई थी, जिनमें आय सीमा का अभाव प्रमुख था। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि केंद्र सरकार की हज यात्रा सब्सिडी योजना की समीक्षा पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा की जा चुकी है, जिसमें सरकार को 10 वर्षों के भीतर सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का निर्देश दिया गया था, ताकि धन का उपयोग शिक्षा और सामाजिक विकास के लिए किया जा सके। वकील ने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान योजना, जिसे 20 नवंबर 2023 को तैयार किया गया और 16 मार्च 2024 को घोषित संसदीय चुनावों से पहले पेश किया गया, का उद्देश्य मतदाताओं को प्रभावित करना था। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि आय सीमा के अभाव में अमीर लोग भी इस योजना का लाभ उठा सकते हैं, जिससे सार्वजनिक धन का दुरुपयोग होता है। आय मानदंड की कमी पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस योजना में हस्तक्षेप नहीं करेगी। हालांकि, याचिकाकर्ता को अपनी आपत्तियां और शिकायतें राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी गई है। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि कोई प्रतिनिधित्व दिया जाता है, तो राज्य सरकार कानून के अनुसार उस पर विचार कर निर्णय लेगी। अदालत को यह भी बताया गया कि इस योजना के तहत चालू वित्तीय वर्ष में 13 सप्ताह की अवधि में 13 ट्रेनें चलाई जानी थीं, जिनमें प्रत्येक ट्रेन में 1000 श्रद्धालुओं के बैठने की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त, राज्य के विभिन्न स्थानों से विभिन्न तीर्थ स्थलों के लिए प्रतिदिन 10 बसें चलाई जानी हैं, जिनमें प्रत्येक बस में 43 यात्रियों की क्षमता है। इस योजना पर चालू वित्तीय वर्ष में 40 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रावधान है। याचिकाकर्ता ने इस खर्च को करदाताओं के पैसे की बर्बादी बताते हुए कहा कि इससे किसी प्रकार का विकास या जनकल्याण नहीं होगा।
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