डिजिटल ठगी पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: बैंकों की लापरवाही साबित होने पर पीड़ितों को मिलेगा पूरा मुआवजा
- राष्ट्रीय
- (Asia/Kolkata)
देश में तेजी से बढ़ रहे ऑनलाइन और डिजिटल ठगी के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि जांच में वित्तीय संस्थानों की लापरवाही या सुरक्षा में चूक साबित होती है, तो पीड़ितों को हुए नुकसान की पूरी भरपाई के लिए बैंकों को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में पीड़ितों को कम से कम उतनी राशि का मुआवजा अवश्य मिलना चाहिए जितनी राशि उन्होंने ठगी में गंवाई है। ₹800 करोड़ के नुकसान पर जताई चिंता, RBI नियमों की होगी समीक्षामुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आंकड़े सामने रखे। अदालत ने गौर किया कि भले ही इस साल साइबर अपराधों की कुल घटनाओं में लगभग 50 प्रतिशत की कमी आई है, फिर भी पीड़ितों को इस साल अब तक ₹800 करोड़ से अधिक का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। पीठ ने जोर देकर कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा प्रस्तावित नियामक ढांचे में मुआवजा, बचाव के उपाय और संस्थागत जवाबदेही जैसे ठोस प्रावधान होने चाहिए, जिन्हें कड़ाई से लागू किया जा सके। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि नियामक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति देने से पहले सुप्रीम कोर्ट RBI के प्रस्तावित 'नो योर कस्टमर' (KYC) संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा करेगा। इन निर्देशों को 30 नवंबर तक अधिसूचित करने और 31 दिसंबर तक लागू करने का प्रस्ताव है। अदालत के अनुसार, यह ढांचा केवल सामान्य सलाह तक सीमित न रहकर बैंकों के लिए स्पष्ट जिम्मेदारियां तय करे और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई का प्रावधान भी रखे। 'डिजिटल अरेस्ट' के शिकार हो रहे पढ़े-लिखे लोगों पर जताई हैरानीसुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) के जरिए हो रही ठगी के मामलों पर गहरी चिंता और हैरानी व्यक्त की। अदालत ने सवाल उठाया कि व्यापक जन-जागरूकता अभियानों, मीडिया में खबरें छपने और अदालती आदेशों के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी मोबाइल फोन पर गिरफ्तारी के डर में आकर साइबर अपराधियों के जाल में कैसे फंस रहे हैं। सीजेआई सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, "इन पीड़ितों को क्या हो गया है? वे इस तरह जाल में कैसे फंस रहे हैं? क्या वे इतनी बुनियादी बात भी नहीं समझ सकते कि मोबाइल फोन पर कोई किसी को कैसे गिरफ्तार कर सकता है?" उन्होंने कहा कि यदि आपको फोन पर गिरफ्तारी की धमकी दी जा रही है तो मोबाइल फोन को दीवार पर मारिए और गिरफ्तारी वहीं खत्म हो जाएगी। एक लोकतांत्रिक देश में किसी व्यक्ति को यह सोचकर कैसे डराया जा सकता है कि मोबाइल फोन पर उसकी गिरफ्तारी हो रही है? शीर्ष अदालत ने निराशा जताते हुए कहा कि यदि शिक्षित लोग भी इस उम्र में डिजिटल अरेस्ट का शिकार बन रहे हैं तो वे अगली पीढ़ी को क्या सीख देंगे।
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