'मैं सरदारनी हूं, किसी से नहीं डरती': सज्जन कुमार को जेल भिजवाने वाली जगदीश कौर 1984 सिख विरोधी दंगों के सम्मेलन में होंगी शामिल

'मैं सरदारनी हूं, किसी से नहीं डरती': सज्जन कुमार को जेल भिजवाने वाली जगदीश कौर 1984 सिख विरोधी दंगों के सम्मेलन में होंगी शामिल

1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान इंसाफ की लंबी और कठिन कानूनी लड़ाई लड़ने वाली अमृतसर निवासी जगदीश कौर आज चंडीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा आयोजित एक दिवसीय सम्मेलन में प्रमुख प्रतिभागी के रूप में हिस्सा ले रही हैं। न्याय के लिए लड़ी गई इस लंबी कानूनी लड़ाई में जगदीश कौर की मजबूत गवाही के आधार पर ही कांग्रेस के पूर्व कद्दावर नेता और सांसद सज्जन कुमार को पहली बार दोषी ठहराया गया था। उल्लेखनीय है कि 17 दिसंबर 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें सज्जन कुमार को बरी कर दिया गया था। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, 2 नवंबर 1984 को दिल्ली के पालम कॉलोनी (राज नगर) क्षेत्र में जगदीश कौर के पति और 18 वर्षीय बेटे की निर्मम हत्या कर दी गई थी, जिसका मुख्य आरोपी सज्जन कुमार था। 'द ट्रिब्यून' से बातचीत के दौरान अपनी आपबीती साझा करते हुए जगदीश कौर ने बताया कि यह कानूनी संघर्ष बेहद दर्दनाक रहा और व्यवस्था ने उन्हें कई बार तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने खुलासा किया कि सज्जन कुमार के खिलाफ केस वापस लेने के लिए उन्हें 8 करोड़ रुपये नकद, एक प्लॉट और विदेश में बसाने का बड़ा लालच दिया गया था। हालांकि, उन्होंने इन सभी प्रस्तावों को ठुकराते हुए स्पष्ट कहा, "मैं एक सरदारनी हूं और किसी से नहीं डरती।" जगदीश कौर आज इस भाजपा सम्मेलन में ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर अपने संघर्ष की गाथा साझा करेंगी। दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले में राज नगर में 1 और 2 नवंबर 1984 को जगदीश कौर के परिवार के पांच सदस्यों की हत्या से जुड़े चौंकाने वाले तथ्यों का उल्लेख है। फैसले के अनुसार, 2 नवंबर 1984 की सुबह लगभग 9 बजे जब जगदीश कौर शिकायत दर्ज कराने पुलिस चौकी पहुंचीं, तो उन्होंने वहां एक जनसभा होते देखी। वहां मौजूद स्थानीय सांसद सज्जन कुमार उकसाने वाले बयान देते हुए कह रहा था कि "एक भी सिख बचना नहीं चाहिए और जो हिंदू उन्हें शरण दे, उसका घर भी जला दो और उसे भी मार दो।" अदालत के फैसले में यह भी दर्ज है कि जगदीश कौर ने पुलिस चौकी प्रभारी को उपद्रवियों से यह पूछते सुना था कि "कितने मुर्गे भून दिए (कितने सिखों को मार दिया)"। अदालती दस्तावेजों के मुताबिक, इस भयावह मंजर को देखने के बाद जगदीश कौर का मानवता से विश्वास उठ गया था और इस मामले में दिल्ली पुलिस की मिलीभगत भी साबित हुई थी। इस सब के बावजूद, उन्होंने अपने बाकी बच्चों के पालन-पोषण के लिए छोटे-मोटे काम किए और न्याय की लड़ाई को कभी कमजोर नहीं होने दिया।