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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं की भूमिका और देखभाल अर्थव्यवस्था पर जोर

07 Mar, 2026 02:06 PM

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर भारत की महिलाओं की उपलब्धियों के साथ-साथ उनकी मेहनत, समर्पण और परिवर्तनकारी भूमिका को सम्मानित किया जाता है। यह दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है, बल्कि इस बात की पुष्टि है कि भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका हमेशा केंद्र में रही है। आज भारतीय महिलाएं केवल संस्थानों और बोर्डरूम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि घरों, खेतों, प्रयोगशालाओं, कक्षाओं, सुरक्षा बलों और प्रशासनिक तंत्र में भी नेतृत्व की नई मिसाल पेश कर रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रही हैं। रक्षा सेवाओं में महिला अधिकारी लड़ाकू विमान उड़ाने से लेकर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त करने तक महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही हैं। भारतीय इतिहास भी महिलाओं की शक्ति और योगदान का साक्षी रहा है। रानी लक्ष्मीबाई ने साहस के साथ देश की रक्षा की, सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए लड़कियों की शिक्षा की शुरुआत की, जबकि देवी अहिल्याबाई होल्कर ने अपने शासन में जनकल्याण को प्राथमिकता दी। इन महान महिलाओं की विरासत आज भी समाज को प्रेरित करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में देखने की सोच से आगे बढ़ते हुए उन्हें विकास की प्रमुख भागीदार और नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार किया है। महिला-नेतृत्व वाला विकास अब केवल एक विचार नहीं रहा, बल्कि यह नीति निर्माण, शासन और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। समाज की हर बड़ी उपलब्धि के पीछे एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखी शक्ति काम करती है, जिसे “देखभाल अर्थव्यवस्था” कहा जाता है। यह वह अदृश्य शक्ति है जो परिवारों और समाज को निरंतर संभाले रखती है। एक मां का समर्पण, पत्नी की जिम्मेदारी और बेटी की देखभाल—ये सभी इस अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। सरकार इस देखभाल कार्य को समावेशी विकास की नींव के रूप में पहचानते हुए इसे मजबूत बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। भारत में महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर (FLFPR) में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। यह 2017-18 में 23.3 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में बढ़कर 41.7 प्रतिशत हो गई है। यह आंकड़ा आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है। महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी न केवल परिवारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करती है, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाती है। इसी कारण केंद्रीय बजट 2026-27 में देखभाल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है। महिला-नेतृत्व वाले विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता ऐतिहासिक जेंडर बजट में स्पष्ट दिखाई देती है, जिसकी राशि 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के अब तक के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई है। इसके साथ ही सरकार 1.5 लाख देखभाल कर्मियों के कौशल विकास में निवेश कर रही है, कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावासों का विस्तार कर रही है और आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक बनाकर बाल देखभाल सेवाओं को सुदृढ़ बना रही है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य और पोषण प्रणालियों के बीच समन्वय को भी मजबूत किया जा रहा है। यह प्रयास इस विचार को दर्शाते हैं कि जब महिलाओं को आवश्यक सहयोग और अवसर मिलते हैं, तो पूरी अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियों से जुड़े कानूनों के माध्यम से बाल देखभाल केंद्रों और कर्मचारियों के कल्याण से जुड़े प्रावधानों को भी मजबूत किया गया है। यह सुधार इस सिद्धांत को दर्शाते हैं कि बाल देखभाल सहायता कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय की एक महत्वपूर्ण आधारशिला है। सरकार महिलाओं और बच्चों को, जो देश की कुल आबादी का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं, राष्ट्रीय नीतियों के केंद्र में रखती है। उनकी समग्र भलाई को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक आवश्यकता माना जा रहा है। तेज़ी से हो रहे शहरीकरण, बढ़ते प्रवास और छोटे परिवारों के बढ़ते चलन ने पारंपरिक सामाजिक सहयोग प्रणालियों को बदल दिया है। ऐसे में सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल तथा पारिवारिक सेवाओं की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। देखभाल अर्थव्यवस्था में निवेश कई राष्ट्रीय लक्ष्यों को मजबूत करता है। इससे महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ती है, बच्चों के विकास में सुधार होता है, बुजुर्गों की भलाई सुनिश्चित होती है और सम्मानजनक रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं। जैसे-जैसे भारत ‘अमृतकाल’ से ‘विकसित भारत @2047’ की ओर बढ़ रहा है, यह स्पष्ट हो रहा है कि सामाजिक आधार मजबूत किए बिना विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। इस दिशा में देखभाल अर्थव्यवस्था एक महत्वपूर्ण आधारशिला के रूप में उभर रही है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर यह संकल्प दोहराया गया है कि समाज में देखभाल से जुड़े अदृश्य श्रम को सम्मान और संस्थागत समर्थन दिया जाएगा। महिला-नेतृत्व वाले विकसित भारत की परिकल्पना केवल संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि मजबूत देखभाल प्रणालियों पर आधारित है, जो महिलाओं के अवसरों, सम्मान और आर्थिक संभावनाओं का विस्तार करती हैं। – श्रीमती अन्नपूर्णा देवी

Posted By: Daily Suraj Bureau

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