पंजाब में 25 वर्षों में एनडीपीएस एक्ट के तहत 2.46 लाख मामले दर्ज, चुनावों में फिर छाया नशे का मुद्दा

पंजाब में 25 वर्षों में एनडीपीएस एक्ट के तहत 2.46 लाख मामले दर्ज, चुनावों में फिर छाया नशे का मुद्दा

पंजाब में बीते ढाई दशकों के दौरान मादक पदार्थों की तस्करी और संबंधित अपराधों से जुड़े मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जनवरी 2002 से अब तक राज्य में एनडीपीएस एक्ट के तहत लगभग 2.46 लाख मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इस अवधि में पंजाब कई बार देश में एनडीपीएस मामलों के लिहाज से दूसरे या तीसरे स्थान पर रहा है। वहीं, नशीली दवाओं की ओवरडोज से होने वाली मौतों में भी अपेक्षित कमी नहीं देखी गई है। राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ एक बार फिर नशे का मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी अपनी ‘युद्ध नशों विरुद्ध’ मुहिम की उपलब्धियां गिना रही है, जबकि विपक्षी दल नशे से होने वाली मौतों और बढ़ती चुनौतियों को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। यह चौथा अवसर होगा जब पंजाब विधानसभा चुनावों में नशा प्रमुख चुनावी मुद्दों में शामिल रहेगा। आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2002 से अब तक राज्य में एनडीपीएस एक्ट के तहत कुल 2,45,995 मामले दर्ज हुए हैं। कप्तान अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के पहले कार्यकाल (2002-07) में पांच वर्षों के दौरान 15,990 मामले दर्ज किए गए, जो प्रतिदिन औसतन 9 मामलों के बराबर थे। इसके बाद अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार (2007-12) के दौरान यह संख्या बढ़कर 27,348 तक पहुंच गई, जहां प्रतिदिन औसतन 15 मामले दर्ज हुए। गठबंधन सरकार के अगले कार्यकाल (2012-17) में मामलों की संख्या लगभग दोगुनी होकर 55,402 हो गई। इसके बाद कप्तान अमरिंदर सिंह के दूसरे कार्यकाल (2017-22) में 52,427 मामले दर्ज किए गए, जो प्रतिदिन लगभग 29 मामलों के बराबर थे। वर्तमान आम आदमी पार्टी सरकार के कार्यकाल में अब तक 94,828 एनडीपीएस मामले दर्ज किए जा चुके हैं। यह औसतन प्रतिदिन 58 मामलों के बराबर है। पंजाब में वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान नशे का मुद्दा प्रमुखता से उभरना शुरू हुआ था। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनावों में यह विषय पूरी तरह राजनीतिक बहस पर हावी रहा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नशे के मुद्दे पर दिए गए बयानों ने भी इस चर्चा को व्यापक बनाया। वर्ष 2014 में ड्रग्स से जुड़े सबसे अधिक 14,654 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों से पहले कप्तान अमरिंदर सिंह ने नशे को चार सप्ताह में समाप्त करने का दावा किया था। इसी तरह 2022 के चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक ने चार महीने में नशे पर नियंत्रण की बात कही थी। अब आगामी चुनावों से पहले पंजाब भाजपा ने राज्य को नशामुक्त बनाने का नारा दिया है। विपक्षी दलों का आरोप है कि राज्य में नशे की होम डिलीवरी तक हो रही है, जबकि आम आदमी पार्टी सरकार का कहना है कि उसने नशा तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। सरकार तस्करों की संपत्तियां जब्त करने और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई जैसे कदमों को अपनी उपलब्धि बता रही है। विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि राज्य से ‘चिट्टा’ पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वहीं, आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अमन अरोड़ा का कहना है कि सरकार नशे के खात्मे के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। हाल ही में राज्य सरकार ने ड्रग सर्वेक्षण का कार्य भी पूरा किया है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने डोप टेस्ट के आधार पर भी कई मामले दर्ज किए हैं, जिसके चलते बड़ी संख्या में नशे के आदी लोग भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आए हैं। सरकार ने ऐसे मामलों का भी अलग आकलन कराया है, जिनमें बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ बरामद किए गए थे। इस बीच, संगरूर जिले के गांव तूरबंजारा के मजदूर गुलजार सिंह की मृत्यु के बाद नशे का मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है। मौजूदा हालात संकेत दे रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों में भी नशा एक प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बना रहेगा।