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गदर से नक्सलबाड़ी तक: बाबा बूझा सिंह के संघर्षपूर्ण जीवन की झलक

18 Mar, 2026 10:35 AM

प्रसिद्ध लेखक गुरभजन गिल ने क्रांतिकारी देशभक्त बाबा बूझा सिंह को याद करते हुए उनके जीवन और संघर्ष पर प्रकाश डाला है। बाबा बूझा सिंह गदर पार्टी के दूसरे चरण के दौरान अर्जेंटीना में सक्रिय रहे और बाद में मॉस्को के रास्ते भारत लौटकर कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े। पार्टी की नीतियों से असहमति के चलते उन्होंने तेजा सिंह स्वतंत्र और अन्य साथियों के साथ मिलकर लाल कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया। हालांकि बाद में सभी साथी फिर से कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। नवांशहर के बंगा के पास स्थित गांव चक्क माईदास में जन्मे बाबा बूझा सिंह को एक जुझारू लोकनायक के रूप में जाना जाता है। साल 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के उभार के दौरान वह इस आंदोलन से जुड़ गए। उनके बढ़ते प्रभाव से प्रशासन चिंतित था। जानकारी के अनुसार, 27-28 जुलाई 1970 की रात उन्हें फिल्लौर के पास से पुलिस ने हिरासत में लिया और कड़ी यातनाएं दीं। बाद में बंगा थाने में भी उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया। उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, नवांशहर-चंडीगढ़ सड़क पर एक सुनसान पुल के पास पुलिस मुठभेड़ का रूप देकर उनकी हत्या कर दी गई। उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल थे। बाबा बूझा सिंह के जीवन और संघर्ष पर लेखक अजमेर सिद्धू ने “एक अनकही कहानी: बाबा बूझा सिंह गदर से नक्सलबाड़ी तक” शीर्षक से एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है, जिसका अंग्रेजी में भी अनुवाद हो चुका है। उनकी स्मृति में मानसा में “बाबा बूझा सिंह भवन” का निर्माण किया गया है। उनकी शहादत ने साहित्यकारों को भी प्रभावित किया। प्रसिद्ध कवि शिव कुमार बटालवी ने “रुख को फांसी” शीर्षक से कविता लिखी, जिसका अंग्रेजी अनुवाद निरुपमा दत्त ने किया और जिसे ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित किया गया था। इसके अलावा, संतोष सिंह धीर की कविता “इनाम” में भी बाबा बूझा सिंह के संघर्ष और शहादत का उल्लेख मिलता है। इन रचनाओं के माध्यम से उनके जीवन और विचार आज भी समाज में गूंजते हैं।

Posted By: Daily Suraj Bureau

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